"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय | धीमहि तन्नः परशुराम: प्रचोदयात् ||"

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एकता एक दिखने से भी आती है

एकता एक दिखने से भी आती है

14 Dec 2020 जुगुल किशोर तिवारी प्रयागराज 171

सनातन के चिन्ह

हम सब आम भाषा में सुनते आ रहे हैं कि जो "दिखता है वह बिकता है" इसका तात्पर्य यह है कि बाहरी आवरण देखकर ही व्यक्ति या वस्तु की पहिचान और तदनुसार उसके महत्व को आका जाता है। सनातन धर्म के मानने वाले प्रारम्भ से ही इस तथ्य को समझते थे अतएव उन्होंने सनातनियों के लिए विभिन्न संस्कारों के माध्यम से विभिन्न चिन्ह धारण करने के विधान किये थे। यद्यपि वर्णधर्मानुसार इन चिन्हों में सूक्ष्म भेद पाए जाते थे किंतु समग्रता में वे एक मत के पोषक ही अभिहित होते थे। क्या थे ये चिन्ह? शिखा, तिलक एवं यग्योपवीत जिसे जनेऊ भी बोला जाता था, ये चिन्ह हुआ करते थे। जब समाज इन चिन्हों को धारण करता था तो आपसी एकता की अनुभूति होती थी। आज भी अधिकांश सिख तथा मुस्लिम मतावलम्बी अपने पंथ के चिन्ह दाढी, पगड़ी, टोपी आदि धारण करते हैं। इनको उनके पंथ विशेष के चिन्हों में देखते ही समान पंथ के लोगों में आत्मीयता उत्पन्न होती है तथा विपरीत पंथ विशेषकर सनातनियों को उनकी एकजुटता एवं प्रभाव का संदेश भी जाता है। इसी प्रभाव के दृष्टिगत ही तो सनातनी उनका अभिवादन उनके पंथ के अनुसार ही अस्सलाम वालेकुम, सलाम या जय शत श्री अकाल से करते हैं। किन्तु स्वयं इस महत्व को समझने के बावजूद अपने चिन्ह एवं वेशभूषा धारण करने से परहेज करते हैं। इसे विभिन्न राज्यों की पुलिस अथवा सेना की टुकड़ियों से भी समझा जा सकता है कि वे एक दूसरे को अपने ही वर्ग, सिद्धांत, विचारधारा का मानते हुए एकजुट होकर अपने कर्तव्यों का पालन करें और विपरीत वर्ग के लोग उनकी एक से वेशभूषा से प्रभावी संदेश ग्रहण करें। यद्यपि यह लेखन सामान्य समझ वालों के लिए उदाहरणस्वरूप ही किया गया है वास्तव में सनातन के उल्लिखित चिन्ह तो शुद्ध जीवन के स्वास्थ्य विज्ञान से सम्बंधित हैं, जिस विषय पर अलग से सामग्री प्रेषित करेंगे। सत्य सनातन की क्या पहचान? शिखा जनेऊ तिलक निशान।।
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