चिन्तन
क्या हम कभी अपने सामाजिक उत्थान के बारे में सोचेंगे
<p>क्या हम कभी अपने सामाजिक उत्थान के बारे में सोचेंगे , कुछ दिन पहले कर्णाटक असेम्बली में जो पर व्यक्ति आय के बारे वहां बताया गया उसे जान कर अब भी अगर हमारा समाज नहीं सचेत होगा तो अपनी
क्या हम कभी अपने सामाजिक उत्थान के बारे में सोचेंगे , कुछ दिन पहले कर्णाटक असेम्बली में जो पर व्यक्ति आय के बारे वहां बताया गया उसे जान कर अब भी अगर हमारा समाज नहीं सचेत होगा तो अपनी दुर्दशा के लिए दूसरों द्वारा किये गए क्रिया कलाप से जयदा हम खुद जिमेदार होंगे। रिकॉर्ड के अनुसार ईसाई १५६२ रूपए औ बी सी ९१४ मुस्लिम ७९४ एस सी ६८० एस टी ५७७ और ब्राह्मण ५३७ रूपए थी , आप अंदाजा लगा लीजिये की देश के सबसे निचले पायदान पे आप आ गए हैं, लोगों के मुकाबले अपनी जनसँख्या कुछ कम है जिससे हमारे अधिकारी कई जगहों पर दिख जाते हैं और हम ये मान लेते हैं की सब अच्छा चल रहा है , जो अधिकारी वर्ग आप को दिख रहा है ओ बस ५-७ साल और , नयी नियतकिओं में हमारी भागीदारी कम हुई है , एक सर्वे के अनुसार आंध्र प्रदेश में ७५% घरेलु नौकर ब्राह्मण है,दिल्ली के कुली और रिक्शा चलाने वालों की बात किसी से छुपी नहीं है, इस देश और समाज के अपना सर्वोच्च बलिदान देने के बाद भी आज हमारी ये दुर्गति सिर्फ इसलिए है क्यूंकि हमने खुद के विकास के बारे में तो सोचा लेकिन कभी सामजिक जिम्मेदारी के बारे में नहीं सोचा , एक बार को अपने इतिहास के बारे में थोड़ा सा भी सोचे तो एहसास हो की क्या कुछ नहीं खोया हमारे पूर्वजो ने की आज हम खुद को ब्राह्मण कह सकें।इतिहास के बारे में फिर लिखूंगा आज बस ये सवाल आप सब से है की क्या हम कभी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के बारे में चिंतन करेंगे