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क्रूरता के सौ वर्ष चिन्तन

क्रूरता के सौ वर्ष

14 May 2019 प्रदीप शर्मा हरिद्वार 369

<p>इस वर्ष हम अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में हुई असाधारण पाषविकता और चरम नस्लवाद की क्रूरता के 100वें वर्ष में प्रवेश कर चुके हंै</p>

इस वर्ष हम अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में हुई असाधारण पाषविकता और चरम नस्लवाद की क्रूरता के 100वें वर्ष में प्रवेश कर चुके हंै। 
इसे संयोग ही कहेंगे कि इसी वक्त हमारे देष में 17वीं लोकसभा के आम चुनाव भी हो रहे हंै। राष्ट्रभक्ति के शोर में इस असाधारण मुद्द्े का कहीं कोई जिक्र न होना आश्चर्यचकित करने वाला लगता है। संतोषजनक सिर्फ इतना है कि पंजाब विधानसभा ने सर्वसम्मत से प्रस्ताव पारित कर ब्रिटिश सरकार से ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद की सबसे निर्मम याद के लिए माफी की मांग रखी है। दूसरी तरफ ब्रिटिश संसद हाउस आॅफ लाइर्स ने उस नरसंहार पर बहस का प्रस्ताव रखा है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1920 में भी हाउस आॅफ लाड्रर्स ने इस पर बहस की थी और अपने ब्रिगेडियर जनरल डायर की क्रूरता को माफी दे दी थी। विगत 100 वर्षांे में ब्रिटिश संसद ने अपनी उन जालिम कृत्यों पर कोई बहस जरूरी नहीं समझी जो भारतीय हृदयों में हर वर्ष शूल बनकर चुभती जा रही है। हाॅं इतना जरूर बताया जा रहा है कि ब्रिटिश सरकार माफी मांगने पर विचार कर रही है। ब्रिटिश सरकार में विहप बैरनॅस एनाॅबल गोल्डी ने कहा है कि उनकी सरकार इस शताब्दी को बहुत सम्मानपूर्ण तथा उचित तरीके से मनाना चाहती है परन्तु उनकी मनोदशा क्या है इसे बैरनॅस की इस टिप्पणी से समझा जा सकता है- वह कहती हंै इतिहास दोबारा नहीं लिखा जा सकता और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हम अतीत के जाल में न फसें साथ ही उन्होनें यह भी जोड़ दिया कि उस वक्त की सरकार ने इस अत्याचार की घोर निन्दा की थी जो कि सरासर झूठ है। यही नही प्रधानमंत्री थेरेसा इस बर्बर नरसंहार को शर्मनाक बता सकती है, और इस पर अफसोस भी जता सकती है, परन्तु माफी नहीं मांग सकती।  
पाठकों को स्मरण रखना होगा कि 13 अप्रैल 1919 जलियांवाला बाग जो तीन तरफ से बंद था उसके अन्दर पुरूष, महिलाएं तथा बच्चों की बड़ी संख्या मौजूद थी, ब्रिटिश हुकूमत की ओर से कोई पूर्व सूचना प्रसारित नहीं की गई थी कि वहां एकत्रीकरण गैर कानूनी है। फायरिंग से पहले कोई आदेश नहीं दिया गया कि शांतिमय ढंग से लोग अपने घर को लौट जाएं। इसके उलट मुख्यद्वार पर डायर गाड़ी और सैनिक टुकड़ी के साथ मौजूद रहा मश्ीनगनों से 150 गज की दूरी से फायरिंग भी करवाई गई। जिन्होंने अंग्रेजों के काले युग पर एक पुस्तक लिखी है, वो भी यह बताती है कि डायर ने अपने सैनिकों को  यह भी बताना जरूरी नहीं समझा कि वह हवाई फायर करें या लोगों के पैरों को निशाना बनाएं। उसके फायरिंग के आदेश पर तो निहत्थे, असुरिक्षत जनसमूह की छातियों, चेहरों तथा माताओं की कोख को निशाना बनाया गया जो मौजूद दस्तावेज कहते हंै। उस वक्त 1650 राउंड चलाए गए और फायरिंग तब रूकी जब गोलियां खत्म हो गई। ब्रिटिश सरकार के अनुसार 370 लोग मारे गए। जैसा कि सर्वविदित है हमारे देश की अधिकाशंतः व्यवस्था आज भी ब्रिटिश शासन की नीतियों का अनुसरण करती आ रही हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उस जुल्मों सितम के शिकार करीब 1400 लोग हुए थे। सन्तुष्ट डायर ने कहा था कि शायद ही कोई गोली फिजूल गई हो जो घायल थे और जिनकी श्वास चल रही थी उन्हंे कोई सहायता नहीं दी गई। 
इतिहासकार राजमोहन गांधी लिखते हंै 13 अप्रैल की रात मरने वाले तथा मारे गए लोगों ने कुत्तों और गिद्धों के साथ बिताई थी उसके बाद जो हुआ वह और भी शर्मनाक था। ब्रिटिश सरकार द्वारा पछतावा तो दूर इसके उलट दमन शुरू कर दिया गया। जवाहर लाल नेहरू ने बडी क्रूरता तथा अकथनीय अपमान का जिक्र किया है। पंजाब में भारतीय नेताओं को उन तंग पिजरों में रखा गया जिसमें वह पूरी तरह से खड़े भी नहीं हो सकते थे। कुछ शहरों में नरसंहार के विरूद्ध विरोध के लिए इकठ्ठे हुए लोगांे पर ब्रिटिश वायुसेना ने बमवर्षा भी की थी। बैरनॅस का यह कहना कि ब्रिटिश संसद ने इस घटना की निंदा की थी सरासर मिथ्या है बल्कि सत्य तो यह है कि इसकी अनदेखी कर दी और संसदीय आयोग ने डायर को केवल अनुमान की गलती का दोषी पाया। 
हाउस आॅफ लाड्र्स में बैठे सत्ता मद में पूरे गोरों ने विश्वासमत पारित कर हमारे जख्मों पर नमक छिड़क और आपस में सहयोग कर डायर को 20,000 पांैड़ और एक तलवार भेंट की उसे सम्मानपूर्वक रिटायर होने दिया गया। वहीं प्रभावित सरकारी आकडों के अनुसार 370 लोगों में 500-500 रूपयों की सहायता राषि प्रदान की गई। 
अक्टूबर 1997 में भारत की तीसरी यात्रा पर महारानी एलिजाबेथ जलियांवाला बाग र्गइं तो 30 सैकंेड खामोश खड़ी रही लेकिन शाही घंमड में इस खामोशी को उन्हांेने तोड़ा नहीं। उसने न माफंी मांगी, न सहानभूति प्रकट की और न ही उस खूनी कांड की निंदा की जो उनके दादा जार्ज पंचम के नाम पर किया गया। उसके एक दिन पहले एक भोज के दौरान उनके लापरवाह कथन थे यह छिपी हुई बात नहीं है कि हमारे अतीत में कई मुश्किल घटनाएं हुई थीं। जलियांवाला  इसकी दुखःद मिशाल है....... लेकिन इतिहास दोबारा नहीं लिखा जा सकता इसमें कई दःुखद क्षण है और कई खुशी के क्षण..... खुशी क्या थी ब्रिटिश शासन के हम अन्जान हंै। 
समय चक्र परिवर्तित हुआ ब्रिटेन के युवा प्रधानमंत्री ने कूटनीतिज्ञ दबाव को समझा और इसे ब्रिटिश इतिहास की शर्मनाक घटना की संज्ञा दी परन्तु माफीनामों पर वह भी खामोश रहे। उलट यह सलाह दे गये कि इतिहास में वापस जाना सही नहीं फिर इतिहास की औपचारिकता क्यांे? जबकि जर्मनी ने दशकों नाजी अत्याचार के लिये प्रायश्चित किया है क्यांेकि वहां ब्रिटिश माफ करने को तैयार नहीं थे। सवाल यह है कि जज कौन होगा? जिन लोगांे ने हत्याकांड को अंजाम दिया या फिर वह जो बेकसूर शहादत को प्राप्त हुए? जर्मन इतिहास में ब्रिटेन बारम्बार वापिस गया और उन्हें नाक रगड़ने को विवश किया यही पैमाना उस पर ब्रिटेन पर क्यूंकर लागू नहीं होना चाहिए? इसलिए देश उनसे माफीनामें की अपेक्षा रखता है। भारतीय मानस पर खूनी वैषाखी का जख्म गहरा है क्योंकि जो लोग वहां एकत्रित हुए वह ‘रोलेक्ट एक्ट’ की मुखालफत करना चाहते हंै और अन्य अपने पारम्परिक त्यौहार वैशाखी की खुशियां अपनों के संग बांटना चाहते थे। उनका उद्द्ेश्य समस्त क्रांति कदापि नहीं था। उन निहत्थों, निरीह लोगांे को असमय मौत के घाट उतारना क्रूरता के अलावा कुछ नहीं था। अमर शहीद ऊधमसिंह ने उस घटना को दिल पर लिया और ‘जनरल डायर’ को 13 मार्च 1940 में घर में घुसकर मौत की नींद सुलाया। फलस्वरूप 31 जुलाई 1940 को उन्हें इग्लैण्ड स्थित पेटविन जेल में फांसी दे दी गई। इतिहास की क्रूरता और शहीद के बलिदान का अवसर है वैशाखी के अवसर पर हम दोनों को बारम्बार नमन् करते हैं। 

 

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