जाती कर्मणा या जन्मना
23 Feb 2021
डॉ निमेष शुक्ल
लखीमपुर
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विचार
सम्मानित महानुभावों इस विषय पर भिन्न भिन्न धर्म ग्रंथो के भिन्न भिन्न मत हैं, आप सब विद्वत जन उससे परिचित हैं परंतु आज के परिपेक्ष में क्या प्रासंगिक है इस पर आइये विचार करते हैं।मेरी नजर में तो जाती जन्मना ही होती है कर्म से उसे परिवर्तित नही किया जा सकता।क्योंकि की जिस प्रकार वंश परंपरा उत्तरोत्तर आगे बढ़ती है उसी के साथ भी गुणों का भी स्थानांतरण होता रहता है। और यदि गुण वंश परंपरा से आ रहे हैं तो उन पर आधारित कर्म भी वंशानुगत ही हुए, ऐसे में यदि प्रारब्ध के पापों के प्रतिफल संस्कारों के द्वारा मिलने वाले गुणों को अपवाद स्वरूप मान ले तो लगभग जातिगत कर्म भी कमोवेश हजारों वर्षों से यथावत उत्तरोत्तर स्थानांतरित होते आ रहे हैं।उन्हीं प्रारब्धगत परिणाम के प्रतिफल में मिलने वाले विकृत संस्कारो का परिणाम विजातीय विवाह और वर्णसंकर सन्तानो की उत्पत्ति है जिसके कारण वर्णसंकर में कर्मसंकर का प्रकट होना सहज ही है।कर्मसंकर ऐसे में कर्म संकर से संकर जाती होने पर जाती का निर्धारण ही नहीं हो पायेगा।इसलिये कर्मधारित जाति की परिकल्पना उचित नहीं है ऐसामेरा मानना है।मैं कितना सही हूँ यह तो आप सब के विचार आने के बाद ही स्पस्ट हो पायेगा।दूसरे पहलू पर विचार करते हुए यदि आध्यात्मिक दृष्टि का त्याग कर दे तो भौतिक जगत में यदि देखे तो तमाम ब्राह्मणों और क्षत्रियों ने आजीविका के लिए अपने जातिगत कर्मो से हेय कर्मो को अपना लिया परन्तु उनमें स्वभावतः अपने पैतृक कर्म स्वतः प्रकट होते ही है,लाख प्रयासों के बावजूद भी वो आजीविका के कर्मो में स्वयं को ढाल नही पाते।ठीक इसी प्रकार कुछ श्रेष्ठ कार्यो को करने वाले जो जातिगत रूप से उस परंपरा से नही आते वो भी अपने कार्य या कर्मो के साथ सहज न्याय नहीं कर पाते।इस प्रकार मुझे यही लगता जाती जन्मना ही निर्धारित होती है।आपका क्या विचार है कॉमेंट करे।जय परशुराम।