चिन्तन
परम सत्ता के परम सिद्धान्त का सूक्ष्म प्रयास
26 Jul 2019
पंडित रविन्द्र द्विवेदी
जालौन
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आत्म चिंतन
जय श्री परशुराम जी भगवान की।
राम राम।
स्वयं की संभावना को तराशे सभी समाधान स्वयं में छिपे।
हम सभी को उत्सुकता रहती है कि ईश्वर को देखे।
क्या आप भी परमात्मा को देखना चाहते है।
जिस प्रकार प्रकति से लेकर हमारा शरीर व् संसार के सभी कार्य एक सिद्धान्त के अंर्तगत में काम करते है और जब तक उस सिद्धान्त का हम पालन नही करते तब तक हम सफल नही होते।
इसी प्रकार परमात्मा को पाने के सिद्धांत है।
जिसमे सर्व प्रथम है अपने माता पिता की श्रद्धा भाव से सेवा करनी होगी।
क्या कभी हमने विचार किया कि हमारे शरीर से लेकर संसार की सभी क्रियाएं अपने अपने सिद्धान्त पर काम करती है और उन्हें उस सिद्धान्त अनुपालन से सभी जगह प्राप्त किया जा सकता है।
जैसे उदहारण रोटी है चाहिए हंमे तो उपजाऊ खेत गेंहू बीज का बोना उगना फूलना पकना के बाद गेंहू बनना गेंहू के बाद आटा के बाद पानी से मढ़ना के बाद गर्म तवे के बाद आग में सेकना।
ये सिद्धान्त रोटी में काम करता है।
अब ये सिद्धान्त आप अपने घर में करे या विदेश में जंगल में करे या जहाज में रोटी तक पहुचने के लिए सर्व भौमिक सिद्धान्त है।
इसी तरह प्रकति भी सिद्धान्त पर काम करती है पृथ्वी सूर्य सभी एक नियम पर सदियों से चल रहे है।
इसी प्रकार परमात्मा की प्राप्ति आनंद की प्राप्ति के भी सिद्धान्त है जिसने जान पाया उसने पा लिए जो वंचित रहा असफल रहा उसने इसे कल्पित मिथ्या बता दिया।
परमात्मा की इस सृष्टि में कण से लेकर आकाश गंगा तक सिद्धान्त बल से आज तक अटल है।
इस प्रकति में एक भी घटना सिद्धान्त के विरोध में नही होती।प्रकति की सिधान्तो में कोई अपवाद नही।
बात ये है कि हम उन सिद्धांतो को यथार्त में समझ नही पाते जितना समझ आया उसे ही अंतरिम मान्यता देने का प्रयास करते है।
भगवान् क्यों नही दीखते जब हम उनके अंश है ये प्रश्न सभी के मन में होता है।
पर कभी किसी के मन में ये बात नही आती की भगवान् और भक्त के मिलने दिखने का सिद्धान्त अवश्य होगा जब भगवान् की सृष्टि में सब कुछ सिद्धान्त पर टिका तो भक्त भगवान् का मिलना भी किसी सिद्धान्त पर होगा।
आइये चिंतन करे।
दर्शन के लिए एक दिखने वाला और एक देखने वाला तो अनिवार्य घटक है।तभी दर्शन की घटना घटेगी यदि दो नही है तो दर्शन की क्रिया हो ही नही सकती।
द्रष्टा दृष्टि दर्शन और दृश्य इस सिद्धान्त के अंग है।
और निम्न शर्ते है।
1-एक संकल्प (विचार)दृश्य के दर्शन का
2-फिर ये भी की दृश्य जहाँ हो दृष्टि भी वही हो तब ही दृश्य दर्शन होगा यदि दृश्य के विपरीत हम देखेंगे तो दृश्य नही दिखेगा
3-द्रष्टा की आँखों में रौशनी हो और दृश्य के ऊपर प्रकाश हो
4-द्रष्टा और दृश्य के बीच कोई अपारदर्शी व्यवधान न हो ये भी आवश्यक है।
द्रष्टा की पात्रता में उसे कर्ता पन से मुक्त होना भी अनिवार्य है क्यों की देखने वाला करता नही करने वाला देखता नही।जैसे आँखे देखती है पर कर नही सकती हाथ पैर कर सकते पर वो देखने नही।अग्नि का अनुभव अग्नि नही करती मीठे का अनुभव मीठा नही करता।
क्यों आँख ज्ञानेंद्रिय और हाथ पैर कर्मेन्द्रिय है।
परमात्मा अति सूक्ष्म से लेकर अति विराट है।
अब बात प्रभु दर्शन की।
वेद व् रामायण बताते है कि वो सर्वत्र है अंदर भी है बाहर भी है अंदर सूक्ष्म रूप और बाहर विराट रूप में विद्धमान है।
अब देखे द्रष्टा और दृश्य परमात्मा में प्रकाश है तो पाया दोनो स्वयं प्रकाशित है ।
अब देखना है की कोई अपारदर्शी बाधा तो नही।
यदि आप काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर से मुक्त है तब कोई अपारदर्शी बाधा भी नही।
जो सिद्धान्त होता है वो अटल होता है सत्य और सार्वभौमिक भी होता है।और सिद्धन्तो के कई चरण होते है प्रेतेक चरण की पात्रता आने पर हम उसे पास कर लेते है और उस पर विश्वास भी अटल हो जाता है।
संसार की जटिलताओं ने स्वार्थ मुखी मन मुखी व्यवहार ने हंमे सिधान्तो से विमुख कर दिया सीमित चिंतन के चलते हम व्यापक चिंतन से विमुख हो गए।संसार की नक़ल करते करते अपनी अक्ल का अस्त्तिव भुला दिया।कभी एक बार कुछ समय स्वयं को दीजिये सोचिये समझिये परमात्मा की इस विलक्षण सृष्टि को कैसे नियम बध्द चरण बद्ध सभी जीवों के लिए समर्पित प्रकति को अनुभूति करिये।
जीवो को समर्पित प्रकति जीवो के कृति का कारण है इस पर हम सभी को कृतघ्न होना चाहिए।
सच में संसार की जटिलताओं को समझना सुलझाना कठिन है पर परमात्मा के सिधान्तो को समझना बहुत आसान है।उसकी लिए स्वयं की पात्रता पर्याप्त है
इस सृष्टि में सब कुछ अदि काल से व्यवस्थति है जिन सिद्धांतो को भगवान वेद ने सुन्दर तरह से वर्णित किया।विज्ञान शब्द कोई आज का बना नही है जब से ज्ञान तभी से विज्ञान।
सिंद्धान्तो की सूक्ष्म मीमांसा ही विज्ञान है।विज्ञान गहराइयों तक जा कर उन सूक्ष्म चरणों को बाहर लाता है जो सिंद्धान्तो में छिपे है।विज्ञान कोई सिद्धान्त बनाता नही ।
परमात्मा ने सिद्धान्त के साथ सृष्टि उतपंत्ति की है।
वैदिक काल में ऋषियों मुनियों ने विलासिता को तिलांजलि दे तप त्याग वैराग्य को गले लगा कर परमात्मा से आत्मसात कर परमात्मा की रची सृष्टि के सिद्धन्तो रहस्यों को उजागर किया।
आज का आधुनिक विज्ञान अल्पज्ञ है सिमित है स्थूल तक पहुच है जिसके कारण सृष्टि के रहस्यों से दूर है।
सृष्टि का सिद्धांत सूक्ष्म से स्थूल तक की यात्रा है
आधुनिक विज्ञान स्थूल तक रुक गया तब कैसे प्रकति के नियमो को यथार्थ जान सकता है
सत्य देश काल परिस्थति तक सीमित नही जब की मनुष्य देश काल परिस्थति से बंधा हुआ है सत्य इस सीमा से परे है तभी समान्यय मनुष्य इसे ठीक ठीक यथावत नही जान पाते।
जैसे पिता अपने पात्र पुत्रों को गूढ़ रहस्यों से गोपनीय विषयो से विलग नही रखता उसी प्रकार परमात्मा ने भी अपने अंश आत्मा से कोई भी रहस्य अछूता नही रखा।
जिस प्रकार पिता के समक्ष पुत्र का अहंकार हास्यप्रद होता है उसी प्रकार परमात्मा के समक्ष जीव का अहम परम हास्यप्रद है।
एक सिद्धान्त सर्व भौमिक है।
जनक के ऊपर कभी जन्मा नही जा सकता।जनक की परिधि में ही रहना होगा जन्मा को।
जैसे पृथ्वी व् अन्य गृह सूर्य से जन्मी तो सूर्य के अधीन चक्कर काट रही जल का जनक समुद्र है जल कभी समुद्र में बाढ़ नही सकता।
अदि अदि।
पंडित रविन्द्र द्विवेदी
9451888278