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ब्राह्मण कौन और समाज में इतना उँचा स्थान क्यूं प्राप्त चिन्तन

ब्राह्मण कौन और समाज में इतना उँचा स्थान क्यूं प्राप्त

02 Jul 2019 Anjali Delhi 394

<p><span style="color:rgb(29, 33, 41); font-family:helvetica,arial,sans-serif; font-size:14px">आखिर ब्राह्मण कौन थे और समाज में उनको इतना उँचा स्थान क्यूं प्राप्त था। आखिकार शक्ल सूरत और दिमाग में तो वो शेष लोगों की तरह ही थे फिर इतना सामाजिक स

आर्यों के इतिहास से लेकर आगे पढ़ते हुए मन में एक सवाल उठता है कि आखिर ब्राह्मण कौन थे और समाज में उनको इतना उँचा स्थान क्यूं प्राप्त था। आखिकार शक्ल सूरत और दिमाग में तो वो शेष लोगों की तरह ही थे फिर इतना सामाजिक सम्मान क्यूं मिला हुआ था और साथ ही साथ ब्राह्मणों की हालिया अवस्था पर क्षोभ भी होता था। वैसे तो अब ब्राह्मणों को गाली देना फैशन में शुमार है, परंतु यह बात सोचने की है की कोई भी कौम या किसी समुदाय का 1 वर्ग शेष समुदाय को हज़ारों साल तक मूर्ख नहीं बना सकता। इसलिए यह तो मानना ही पड़ेगा की इतिहास के किसी काल में ब्राह्मणों ने जरूर कुछ ऐसा किया होगा की उन्हे शेष समाज ने इतना उच्च स्थान दिया। ब्राह्मणों की उत्पत्ति की 2 कहानियाँ मैने पढ़ी हैं। पहली की ब्रह्ममा के 9 पुत्र थे और उन्हीं की सन्तान आगे चल कर ब्राह्मण कहलाए और दूसरी कहानी कि सप्तऋषियों ने सर्वप्रथम ब्रह्म का साक्षात्कार किया था इसलिए उनके ही संतती आगे चल कर ब्राह्मण कहलाए। 
अगर हम भारतीय इतिहास को वैदिक काल से शुरु करें तब से आज तक के 5000 साल या उससे भी अधिक के इतिहास में धर्म, साहित्य, आध्यात्म, संगीत, राजनीति से लेकर युद्ध कौशल और सेना में और विदेशी आक्रमण से शस्त्र से लेकर और आध्यात्मिक प्रतिरोध तक हर जगह ब्राह्मणों का योगदान है। अगर वैदिक काल में जाएं तो ब्राह्मणों का मुख्या काम था आश्रमों की स्थापना और शास्त्र और शस्त्रा की शिक्षा देना (प्रायः लोग यह सोचते हैं कि ब्राह्मण सिर्फ किताबी ज्ञान देते थे वो सही नहीं है। उस समय आश्रमों में राजपुत्रों और ब्राह्मणों को शस्त्रयुद्ध कौशल की शिक्षा भी दी जाती थी। महाभारत काल में द्रोण और परशुराम इसके उदाहरण हैं।

सोचने की बात है जो राजकुमार 25 वर्ष की उम्र तक गुरुकुल मे रहते थे वो सिर्फ शास्त्र की शिक्षा कैसे ले सकते थे ( उन्हें शस्त्रों की शिक्षा भी गुरुकुल में ही मिलती थी) पर इस शिक्षा देने के बदले में ब्राह्मणों को जीविका के लिये भिक्षावृत्ति पर ही निर्भर रहन पड़ता था। यह सामाजिक व्यवस्था इसलिए बनाई गयी थी जिससे शिक्षा व्यवसाय ना बने और शिक्षक लालची और लोभी ना होकर सबको समान रूप से ज्ञान दें। अब अगर कोई भी व्यक्ति समाज में इतना बड़ा त्याग करेगा तो उसे सम्मान मिलेगा ही।

वैदिक काल के ब्राह्मणों की उच्च बौद्धिक क्षमता का पता उपनिषद को पढ़कर और समझ कर लगाया जा सकता है मानव इतिहास में में इतने उच्च कोटि की आध्यत्मिक बौद्धिक क्षमता का उदाहरण और कहीं नही है। शायद भारत की अंग्रेज़ों से आज़ादी के पहले का कुछ अपवादों को छोड़कर पूरा साहित्य ब्राह्मणों के द्वारा ही लिखा गया है। इसी तरह चिकित्सा विज्ञान में आज से हज़ारों साल पहले भारत में कई जटिल ऑपरेशन किए जाते थे जिन्हें आज भी चिकित्सा विज्ञान मान्यता देता है।

संगीत में तन्ना पाण्डेय (तानसेन) या बैजू बावरा(बैजनाथ चतुर्वेदी) अमर नाम है। हालांकि संगीत की उत्पत्ति सामवेद से ही हो गयी थी पर इसका श्रेय भी ब्राह्मणों को जाता है। भारत पर विदेशी आक्रमण का पुराना इतिहास रहा है एक शक्तिशाली भारत के निर्माण और विदेशी आक्रमण का सामना करने के लिये चाणक्य-पुष्पमित्रा से लेकर माधवाचर्या विद्यारण्या तक- और उसके बाद मुग़लकाल में भी तुलसीदास एवं अन्या संतों ने हिन्दुओं को धर्म से जुड़े रहने में अहम योगदान दिया और यह बात ब्रिटिश राज के दौरान अंग्रेज़ों के खिलाफ किये गये संघर्ष में भी देखी जा सकती है।

परंतु ऐसा नही है की सब कुछ इतना ही सुन्दर और शालीन था जितना दिखता है। आप किसी व्यक्ति,वर्ग या समाज को कितना भी आदर्शवादी क्यूं ना बनाएं लोभ, मोह और स्वार्थ से सभी का ऊपर उठ पाना संभव नही होता और यही उत्तर वैदिक काल के ब्राह्मणों के साथ हुआ। पुराणों में भृगु की शिव के गणों के द्वारा दाढ़ी-मूछ उखाड़ कर अपमानित करने का जिक्र है। क्योंकि भृगु ने सत्ताधारी और धनवान दक्ष का साथ दिया था। इसी प्रकार महाभारत में द्रोणाचार्य का धन के लालच में राजगुरु बनना और कुछ विद्याओं का चोरी-छुपे सिर्फ अश्वत्थामा को ज्ञान देना इसका उदाहरण है।

यह बात सही है कि ऊंचाई पर बैठे व्यक्ति का चरित्र बहुत महान होना चाहिए अन्यथा उसका और समाज दोनो का पतन हो जाता है और समाज को भी आदर्शवादी और त्यागी पुरुष से सिर्फ अपेक्षा ना रखकर उसे उचित सम्मान देना चाहिये अन्यथा समाज के लिये त्याग करने वाला व्यक्ति विद्रोही और लालची हो जाता है।

भारतीय समाज में यहीं गलती हुई आदर्शवाद के शिखर पर बैठे ब्राह्मणों में लालच और भौतिक सुखों के मोह और उनसे सिर्फ अपेक्षा रख कर आए दिन अपमानित करने वाले समाज की वजह से सामाजिक गिरावट आई (राजा नहुष द्वारा सप्तऋषियों से पालकी उठवाने से लेकर, जमदाग्नि-रावण-वृत्तासुर की हत्या और चाणक्य को अपमानित कर राजमहल से बाहर फिंकवाने की घटनाएं और ऐसी ही बहुत सारी घटनाएं इसका उदाहरण हैं ) । यह गिरावट हालांकि उत्तर वैदिक काल से लेकर मौर्य वंश तक कम थी परंतु उसके पश्चात बौध धर्म के बढ़ते प्रभाव की वजह से नए और कठोर सामाजिक नियम बढ़ने लगे और साथ ही साथ ब्रहमां और अन्य हिन्दू ज़ातियो पर अत्याचार की प्रेरणा भी और यह उत्तरोत्तर बढ़ता ही रहा और मुग़ल काल में और विकृत हो गया।
अंग्रेजों ने शासन काल के समय मे ब्राह्मणों के सामाजिक श्रेष्ठता के अहसास को खत्म करने की प्रभावी पहल भी की और आज़ादी के बाद लगातार अनवरत (मास प्रोपगॅंडा) से तो ऐसा ही प्रचार हुआ की इस देश की जो भी समस्या आदि काल से अभी तक हुई है वो ब्राह्मणों की ही देन है।
लगातार चल रहे दुष्प्रचारों से अपने इतिहास के साथ साथ ब्राह्मणों ने अपना आत्म सम्मान और मर्यादा भी पूरी तरह खो दी। वैसे भी ब्राह्मण कोई शारीरिक संरचना या असाधारण तीक्ष्ण बुद्धि की वजह से नही त्याग और समाज के लिए समर्पण की वजह से सम्माननीय थे ।आधुनिक भारत में की आधुनिक परिस्थितियों में ब्राम्हण कहे जाने वाले वैदिक ब्राह्मणों के संस्कारों और सम्मान का पूरि तरह लोप हो गया है। हां इस जातिय नाम की वजह से नौकरी और अन्य सरकारी सुविधाओं में जो भेदभाव का सामना करना पड रहा है वो अलग। अब यह समय ही बताएगा कि आगे चलकर समाज क्या रूप लेगा।अब समय आ गया है कि ब्रह्मान अपने आप को आधुनिक और वैदिक ग्यान के अनुरूप धाल के अपना उत्थान करे

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