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वैचारिक रूप से कमजोर व्यक्ति को वश में करना अधिक आसान होता है चिन्तन

वैचारिक रूप से कमजोर व्यक्ति को वश में करना अधिक आसान होता है

20 May 2019 Abhilasha Noida 419

<p><span style="font-size:12px"><span style="font-family:inherit"><span style="font-family:inherit">क्योंकि मानसिकवैचारिक रूप से कमजोर व्यक्ति को वश में करना अधिक आसान होता है,</span></span>समाज को संगठित रखने का प्रयास करने वालों के अस्तित्व पर प्रहार

क्योंकि मानसिकवैचारिक रूप से कमजोर व्यक्ति को वश में करना अधिक आसान होता है

समाज को संगठित रखने का प्रयास करने वालों के अस्तित्व पर प्रहार करने का षड्यंत्र पिछले कुछ दशकों में बहुत तेज़ हुआ है। यदि कुछ स्वार्थ पोषित सिद्धांत समाज के बाकी वर्णों के मन में डाल का उन्हें ब्राह्मण के विरुद्ध खड़ा कर दिया जाए तो समाज को तोड़ना आसान होगा। यही हो रहा है। दुनिया के अन्य देशों को देखें तो वहाँ धर्मान्तरण का कार्य लगभग 95% तक हो चुका है। वहाँ ईसाई और मुस्लिम रिलीजन ने अधिग्रहण कर लिया है। भारत में इतने resources लगाने के बाद भी वो शक्तियाँ सफ़ल नहीं हुईं। कुछ वर्णों को इस तरह के द्वेष पोषित बातों से बरगलाने में ज़रूर सफल हुई हैं। पिछली सरकारों का तो पूरा सहयोग इन शक्तियों के साथ रहा है। फिर भी देश में 80% लोग हिन्दू ही बने हुए हैं। इस षड्यंत्र के विरुद्ध सबसे बड़ी ढाल ब्राह्मण ही रहे हैं और उनकी दी गई वो शिक्षा जो संस्कार के रूप में समाज में, परिवारों में पीढ़ियों से चली आ रही है। फूट डालो राज करो के ऐसे दुष्चक्र में व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि के लिए विन्द जैसे महत्वाकांक्षी लोग आसानी से फंसते हैं। ब्राह्मणों को गाली देना उन्हें ऊपर बढ़ने का सबसे आसान तरीका लगता और जब दाँव उल्टा पड गया, फिर माफ़ी माँगते फिरते हैं। कलयुग में संगठन में ही शक्ति है, सशक्तिकरण है। अभी तो वर्ण नहीं वर्ग विशेष के प्रायोजित ग्रुप्स चलते हैं जिसमें सिर्फ़ फाल्स नैरेटिव गढ़ कर संदेश प्रसारित किए जाते हैं। पढ़ने लिखने और शोध का पूरा ठेका कथित बुद्धिजीवियों को दे दिया गया था, जो संचार माध्यमों में छपते थे और उन आकाओं के उद्देश्य को पूरा करने के लिए लिखते थे। हमारे यहाँ पढ़ाया जाने वाला भारतीय इतिहास ही मुग़ल काल से महिमामंडित होना शुरू होता है। उसके पहले का स्वर्णिम इतिहास तो काल्पनिक कहा जाता है। हमारे बच्चों को भारतीय नायक, वीरांगनाओं की गाथाएं नहीं बल्कि विदेशी हीरो के बारे में जानकारी भरी जाती है। ये राष्ट्र का राजनीतिकरण कर देश, समाज और संस्कृति को खोखला करने का प्रयास ही तो था! पुष्यामित्र शुंग, बाजीराव, समुद्रगुप्त, रामानुजम, रमन, सुश्रुत, चरक, भरद्वाज, पतंजलि, गार्गी,मैत्रेयी, अनुसूइया, सिनगी दई, रानी चेन्नम्मा, दुर्गावती, उदा बाई जैसे हज़ारों प्रेरक नायक नायिकाएँ हैं, उनके प्रसंग क्यों नहीं बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की दिशा तय कर सकते हैं? हमारे देश की परिस्थिति और बैक ग्राउंड इस देश की विभूतियों के अचीवमेंट से नहीं बताए जाएंगे? क्यों भला???
क्योंकि मानसिक, वैचारिक रूप से कमजोर व्यक्ति को वश में करना अधिक आसान होता है। कारण समझें, जाने, मनन करें और देश को तोड़ने, व्यक्ति को व्यक्ति के विरुद्ध खड़ा करने वाली ताकतों को मुँह तोड़ जवाब देने के लिए तैयार हों।

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