चिन्तन
व्यवसाय की शिक्षा और शिक्षा का व्यवसाय
<p><span style="color:rgb(34, 34, 34); font-family:arial,helvetica,sans-serif; font-size:small">अंकवर्षा में डूबता कौशल,इस बार सीबीएसई के परीक्षा परिणामांे के घोषित होने के बाद पता चला कि अब हमारे समाज में कई ऐसे बच्चे पैदा हो चुके हंै, जो गणित,
इस बार सीबीएसई के परीक्षा परिणामांे के घोषित होने के बाद पता चला कि अब हमारे समाज में कई ऐसे बच्चे पैदा हो चुके हंै, जो गणित, विज्ञान, साहित्य, मनोविज्ञान जैसे जटिल विषयांे में शत् प्रतिशत पारंगत हंै। अब वो दिन दूर नहीं जब हमारे समाज से भी एक आइंस्टीन, टेसला, और शेक्सपियर निकलेगा, अब शायद ही कोई दुनिया की ताकत हमको विश्व गुरु बनने से रोक सकती है।
अभी तक कि पंक्तिया पढ़कर के आपको ऐसा लग रहा होगा कि शायद लेखक ने अपना विवेक खो दिया है, और आपको यह जानकर हैरानी होगी कि सीबीएसई के नतीजे पढ़कर के मुझे भी ठीक ऐसा ही लगा। 2 मई 2019 को सीबीएसई के 12वीं कक्षा के जो नतीजे घोषित हुए हैं, उनमें 83.40 प्रतिशत परीक्षार्थी उत्तीर्ण हुए हैं। 95000 विद्यार्थियों ने 90 प्रतिशत से अधिक और 17693 विद्यार्थियों ने 95 प्रतिशत या उससे अधिक अंक हासिल किए। करिश्मा अरोरा और हंशिका शुक्ला ने 500 में से 499 अंक प्राप्त किये, अगर इनके अंक देखे जाएं तो पता चलता है कि इन्होंने इतिहास, मनोविज्ञान, हिंदी और पोलिटिकल साइंस में शत प्रतिशत अंक प्राप्त किये, जिसका अर्थ हुआ कि इन्होंने विषयांे में शत प्रतिशत योग्यता प्राप्त कर ली। अब योग्यता है तो दिखेगी ही, और वैसे भी योग्य बच्चे बस सीबीएसई में ही होते हंै, क्योंकि स्टेट बोर्ड में तो 90 प्रतिशत एक या दो ही बच्चे ला पाते हंै। आज इतिहास और समाजशास्त्र जैसे विषय में शत प्रतिशत अंक प्राप्त होता देख ऐसा लगता है जैसे कि इन्होंने ऐसे उत्तर लिखे जिनको और सुधारा ही नहीं जा सकता और यही नहीं इनके साहित्य जैसे विषयों में भी पूर्णांक हंै, जिससे मात्र यह सिद्ध होता है कि इन छात्रों को कठिन मुहावरांे, दोहा, छंद का गूढ़ ज्ञान है, उनको अब साहित्य की पूर्ण समझ भी है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अनीता रामपाल कहती हंै कि आज CBSE Board बच्चांे को अच्छे मार्क्स देकर के खुश है और वो दूसरे बोर्ड को भी टक्कर दे रहा है, परन्तु क्या सीबीएसई बच्चांे के विषय की गहरी समझ को भी परख रहा है? आज के सीबीएसई के 90 प्रतिशत हमारे समय के 50 प्रतिशत जैसे हो चुके हंै।
एक दूसरी प्रोफेसर पूनम बत्रा कहती हंै कि आज ये ऊंचे मार्क्स लेके आ रहे हंै, क्योंकि अब सीबीएसई ने बहुविकल्प वाले प्रश्न रख दिये हंै जिससे बस अच्छे मार्क्स आ रहे हंै न कि गूढ़ ज्ञान। आज बच्चे उस पैटर्न पर तैयार हो रहे हंै, जिस पर परीक्षा होगी अर्थात् बच्चे मात्र मार्क्स लाने के लिए पढ़ रहे हंै, न कि विषय की गहराई तक जाने के लिए, क्योंकि कई बार बच्चे उत्तर पुस्तिका में आधे अधूरे वाक्य तक लिख देते हंै, और बोर्ड के मूल्यांकन नियमानुसार पूरे माक्र्स प्राप्त कर लेते हंै। अधिक अंक विषय का ज्ञान प्रदर्शित नहीं करते हंै, ये अंक बस यह दर्शाते हंै कि विद्यार्थी ने परीक्षा को पास करना सीख लिया है, क्योंकि साहित्य में आपको पूरे अंक प्राप्त करने के लिए एक-एक मुहावरे, लोकोक्ति, छंद आदि की गहराई से समझ होनी चाहिए, परंतु आज के बोर्ड की मूल्यांकन पद्धति के अनुसार पूरे अंक लाने के लिए इस समझ का होना कतई जरूरी नहीं है, क्योंकि आज सीबीएसई के माॅडल आंसर आसानी से बाजार में मिल जाते हंै, जिनको रटकर के आसानी से अंकवर्षा करायी जा सकती है।
बोर्ड की परीक्षा में अंकवर्षा का एक प्रमुख कारण भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार का शिक्षा के माध्यम से सम्पन्नता को प्राप्त करना भी हो सकता है। वैसे उदारीकरण के दौर में भारतीय और विदेशी कंपनियों में मध्यवर्गीय युवाओं को मोटी तनख्वाह पर नौकरियां मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह साल 2008 के शुरू मंे थोड़ा सुस्त पड़ गया।
सीबीएसई के सेक्रेटरी अनुराग त्रिपाठी जी सीबीएसई के परिणामों को उचित करार देते हुए कहते हंै कि शत प्रतिशत अंक लाना अब बहुत आसान है, क्योंकि बोर्ड ने विषय का सिलेबस फिक्स कर दिया है, और साथ ही बोर्ड ने उत्तर पुस्तिका जांचने का भी एक तरीका निर्धारित कर दिया है। अब त्रिपाठी जी के बयान से तो बस यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि बोर्ड से जो विद्यार्थी शत प्रतिशत अंक लेकर जा रहा है जरूरी नहीं की वो वेल एजुकेटेड हो, हो सकता है वेल ट्रेण्ड हो। मतलबबोर्ड बस मदारी के बंदर तैयार कर रहा है, जो मात्र करतब दिखाना जानते हंै, क्योंकि वह बंदर अपना प्राकृतिक गुण तो पहले ही खो चुका है।
सीबीएसई में कई बच्चे 99 प्रतिशत या इससे भी अधिक लाते रहे हंै, परन्तु ये बच्चे कक्षा 12 के बाद कहांॅ चले जाते हंै पता ही नहीं चलता, हम बस इंतजार करते रह जाते हंै एक नई खोज का, एक नए साहित्य का या फिर एक नए बुद्धिजीवी का।
सीबीएसई के छात्र 90 प्रतिशत से अधिक अंक लाकर के भी किसी बड़े कॉलेज में दाखिला नहीं ले पाते क्योंकि वो उस कॉलेज का कम्पटीशन एग्जाम नहीं निकाल पाते, मैं छात्रों की योग्यता पर सवाल नहीं उठा रहा, मैं यह सीबीएसई की अयोग्यता पर कटाक्ष कर रहा हूँ।
वैसे इस सिक्के के दूसरे पहलू को देखा जाए तो एक और निष्कर्ष निकल के सामने आता है और वो है शिक्षा का व्यवसायीकरण। ये जो समाचार पत्रों के शुरुआती पन्ने पर हम कोचिंग सेंटर का बड़ा सा विज्ञापन देखते हंै, जिसमें कई बच्चांे की फोटो लगी होती है, जिसके नीचे लिखा होता है, की हमारे यहाँ से पैकेज 1 लोगे तो आपके 95 प्रतिशत अंक आ जाएंगे और पैकेज 2 लोगे 90 प्रतिशत आएंगे।
मतलब 2 या 3 पैकेज दिखाए जाएंगे और फिर बच्चे के माता पिता अपनी अधिकतम औकात के अनुसार उस पैकेज को चुनेंगे और फिर अपने बच्चे के भविष्य की उज्ज्वल कामना करेंगे। यहाँ मैं कोचिंग सेंटर के खिलाफ नहीं बोल रहा हॅूं, मैं तो बस पूछ रहा हॅूं की जब सीबीएसई के स्कूल अच्छे हंै तो कोचिंग सेंटर क्यों?
कोचिंग सेन्टर में बस बोर्ड में अधिकतम अंक प्राप्त करने की ट्रिक्स बताई जाती है, बच्चांे को बस तैयार किया जाता है कि वो एक एग्जाम दे दंे, परन्तु क्या उनको भविष्य में होने वाले संघर्षाे के लिए तैयार किया जाता है? क्या ये छात्र अपने निजी जीवन और कॅरियर में उन चुनौतियों का सामना कर पायेंगे, जो चैथी औद्योगिक क्रांति पैदा कर चुके हैं? क्या ये कोचिंग सेन्टर बच्चांे को स्वाध्याय से दूर नहीं कर रहे? क्या ये कोचिंग सेन्टर बच्चांे को अपाहिज नहीं बना रहे? हमारी स्कूली शिक्षा में हो रही यह अंकवर्षा इस बड़े बदलाव का मुकाबला करने की विद्या और हुनर भी बच्चों को दे रही है? शायद बोर्ड़ के ऐसे परिणाम ही बच्चांे को अपंग बना रहे हंै?
ऐसे ही और लेखो के लिए खोले कुम्भ दर्शनम्