साहित्य और कविता
श्री परशुराम चालीसा
23 Jul 2019
पण्डित सुनील नवोदित
चित्रकूट
542
भगवान परशुराम चालीसा
दोहा :-
गुरुवर को करके नमन, धरते हैं अब ध्यान।
मातु शारदा की कृपा, हम पर हो भगवान।।
होकर हमने प्रेमवश, लिखे हृदय के भाव।
पार लगाना हे ! प्रभो ! जीवनरूपी नाव।।
चौपाई :-
जय जय परशुराम सुखकर्ता।
चिरंजीव तुम हो दुखहर्ता।। (1)
पालनकर्ता तुम्हीं हमारे।
तुम ही हो जमदग्नि दुलारे।। (2)
तुम्हीं रेणुका के हो नंदन।
मात-पिता का करते वंदन।। (3)
हो हरि के छठवें अवतारी।
तुम शिव घोषित परशुप्रभारी।। (4)
ऋषि ऋचीक से हरि धनु पाया।
शिव ने कृष्ण कवच पहनाया।। (5)
जय जय विजय कवच के धर्ता।
तीनों लोकों के तुम भर्ता।। (6)
मात पिता के आज्ञाकारी।
महाबली बाघम्बरधारी।। (7)
प्रभो ! तुम्हारी यह प्रभुताई।
तप बल से सब विद्या पायी।। (8)
तुम राक्षस कुल के संहारक।
तुम्हीं हमारे पाप निवारक।। (9)
तुम्हीं जगत के भाग्य विधाता।
तुम ज्ञानी विज्ञान प्रदाता।। (10)
जब जब अरिदल है गुर्राया।
परशु उठाकर उन्हें भगाया।। (11)
तुम समाज के श्रेष्ठ सुधारक।
भारत गौरव शत्रुविदारक।। (12)
तेज प्रताप जगत के पालक।
तुम हो परमपिता हम बालक।। (13)
जगतपिता तुम ब्रह्मदेव हो।
श्रीहरि शिव शंकर त्रिदेव हो।। (14)
जन जन के मन में तुम छाये।
सबका हित करने जग आये।। (15)
तुम्हीं ब्रह्म हो तुम्हीं विधाता।
तुमसे ही यह धरती माता।। (16)
अग्नि तुम्हीं से वायु तुम्हीं से।
जीवन की है आयु तुम्हीं से।। (17)
तुमसे धरती तुमसे अम्बर।
तुमसे ही सब ताल सरोवर।। (18)
नदी तुम्हीं से झील तुम्हीं से।
गहरा रंग सुनील तुम्हीं से।। (19)
है नीला आकाश तुम्हीं से।
जीवन मृत्यु विनाश तुम्हीं से।। (20)
तुम सबके हो मोक्ष प्रदाता।
सुमिरन से ही दुख मिट जाता।। (21)
परशुराम तुम सबके भीतर।
हिय के अवगुण करते बाहर।। (22)
अष्टसिद्धियों के तुम दाता।
नवनिधियाँ नर तुमसे पाता।। (23)
महिमा गाते सभी तुम्हारी।
तुम हो चिरंजीव अवतारी।। (24)
जो तुमको नित मन में ध्याता।
सुख ही सुख जीवनभर पाता।। (25)
कर्म श्रेष्ठ है यही सिखाया।
तुमने सबको है अपनाया।। (26)
तुम्हें कल्कि का गुरु है बनना।
शस्त्र शास्त्र भी अर्पित करना।। (27)
नाथ हमारे हृदय समाओ।
सद्गुण सदाचार दे जाओ।। (28)
हे ! प्रभु सबके हिय में रहना।
करना भक्तजनों का कहना।। (29)
हे ! प्रभु परशुराम अति दानी।
तुम ज्ञानी हो हम अज्ञानी।। (30)
तुमको अर्पित है यह तन मन।
जगे बन्धुओं में अपनापन।। (31)
अपनापन हो मिटे निराशा।
भाई हो भाई की आशा।। (32)
तिलक जनेऊ शिखा धरें हम।
भारत हित में सदा मरें हम।। (33)
भ्राता भगिनी एक राग दें।
दर्द समझ लें अहम् त्याग दें।। (34)
शक्ति स्वयं की हम पहचानें।
अपनों का नित कहना मानें।। (35)
परशुराम तुम ऐसा वर दो।
जीवन को खुशियों से भर दो।। (36)
अंधकार है किसको प्यारा ?
चहुँ दिशि फैला दो उजियारा।। (37)
तुम हो सारे जग के स्वामी।
तुम्हें नमन हे ! अन्तर्यामी।। (38)
सुर नर मुनिजन ध्यान लगावें।
भक्ति प्राप्त कर हृदय जगावें।। (39)
जो भी यह चालीसा गाते।
उनके दुख क्षण में मिट जाते।। (40)
दोहा : -
परशुराम तुमको नमन, शत् शत् बार प्रणाम।
स्वीकारो अब याचना, पूर्ण करो हर काम।।
बोलो परशुराम भगवान की जय !!
जय बोलो सब परशुराम की !!
जय बोलो सब परशुराम की !!
हरि ॐ !!
रचनाकार - पं. सुनील नवोदित ( चित्रकूट )
संपर्क सूत्र : 07753023513 ( व्हाट्सएप )
ईमेल - navoditji@gmail.com
भक्तों को समर्पित ..........