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सुदशा व्रत हमारा वैदिक इतिहास

सुदशा व्रत

29 Apr 2021 ANURAG TRIPATHI Ghaziabad 660

इस व्रत को जब शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि गुरुवार को होती है तब किया जाता है। इस व्रत में लक्ष्मी जी का विधि विधान से पूजन किया जाता है ।प्रातः काल स्नान करके लक्ष्मी जी को स्नान करा कर चौकी

 
   
        इस व्रत को जब शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि गुरुवार को होती है तब किया जाता है। इस व्रत में लक्ष्मी जी का विधि विधान से पूजन किया जाता है ।प्रातः काल  स्नान करके लक्ष्मी जी को स्नान करा कर चौकी में स्थापित करते हैं। कलश स्थापना कर दीपक जलाते हैं। चौकी के नीचे चावल को भिगोकर पीसकर चौक बनाते हैं या फिर सूखे चावल आटा से चौक बना सकते हैं। इसमें  10 प्रकार के फूल चढ़ाए जाते हैं। अगर 10 प्रकार के अलग-अलग फूल ना मिले तो 10 फूल चढ़ा सकते हैं। इस व्रत में  10 संख्या का बहुत महत्व होता है।सिंदूर, चंदन,पीला चावल  ,आंवला पत्ती माता को चढ़ाते हैं। एक आम के पत्ते में 10 दूबी और 10 साबुत चावल को लपेटकर ऊपर "बरत का पीला धागा" लपेट कर लक्ष्मी माता में चढ़ाते हैं। फल, नारियल चढ़ाकर आरती करते हैं । 
     इस व्रत में विशेष रुप से एक व्यंजन बनाकर लक्ष्मी जी को भोग लगाया जाता है जिसे "मडा" कहते हैं ।यह मीठी कचोरी जैसा होता है।व्रती महिला 10 मडा,10 फल के टुकड़े,10 नारियल के टुकड़े  माता को भोग लगाकर स्वयं ग्रहण करती है ,इसे केवल अपने पति और बच्चों को या परिवार के सदस्यों को दिया जाता है।अन्य किसी को नहीं दे सकते।
    भोजन का भोग लगाते हैं। इस दिन लौकी और करेला का प्रयोग नहीं करते ,प्याज लहसुन के बिना भोजन बनाते  हैं ।खीर पूरी या अन्य व्यंजन भी आप बना सकते हैं ।
    अगर आपको मडा बनाना नहीं आता तो आप तो कोई भी मीठी चीज बनाकर 10 की संख्या में भोग लगाइए। 
       प्रसाद लगाने के बाद जो बरत का  पीला धागा  उसमें लक्ष्मी माता के 10 नाम  :
"लक्ष्मी, कमला ,रमा, पदमा, हेममालिनी ,नलिनी, विष्णु प्रिया, सिंधु सुता ,कमलासना, दरिद्र भंजनी " को एक एक करके लेते हुए एक एक गांठ  बांधते जाते हैं । फिर दाहिनी कलाई में बांधकर   माता से आशीर्वाद लेते हैं । इस व्रत को करने से घर में सुख सौभाग्य बना रहता है।बरत पहनने के पहले कथा सुनते हैं ।
  
सुदशा
व्रत की कथा: 
        एक राज्य में राजा वीर विक्रम और उनकी रानी रत्नावली सुख पूर्वक निवास करते थे। राजा के मंत्री का नाम त्रिकूट था और उसकी पत्नी पद्मावती थी ।रत्नावली और पद्मावती एक दिन एक साथ स्नान करने जाते हैं तो रत्नावली के बरत के धागे को देख कर पद्मावती पूछती है। रानी उसे सुदशा व्रत के बारे में बताती है ।मंत्री पत्नी को लगता है कि रानी  व्रत करती है इसलिए ही वह रानी हैं और सुख पूर्वक जीवन जीती है। वह अपने पति से कहती है कि आप रानी का सुदशा बरत  मांग कर लाइये।मंत्री उसे समझते हैं पर वह जिद करने लगती है। राजा का यह नियम था कि कोई भी उनसे किसी वस्तु की याचना करता तो वह उसे मना नहीं करते थे। मंत्री जाकर राजा से रानी के हाथ का सुदशा बरत मांगते हैं ।राजा  जाकर रानी रत्नावली से कहते हैं, रत्नावली अपना व्रत नहीं देना चाहती और बताती है कि इसे किसी को नहीं दिया जाता है। लेकिन राजा कहते हैं कि मंत्री मांगने आए हैं, हम उन्हें खाली हाथ नहीं लौटा सकते , तुम्हें देना ही है। रानी  मन ना होते हुए भी अपना बरत  दे देती है। पद्मावती  प्रसन्न हो जाती है।
     कुछ समय बाद राज्य में विद्रोह हो जाता है और राजा रानी को वन में जाना पड़ता है ।यह सब लक्ष्मी माता के कोप के कारण होता है ।राजा रानी फल तोड़कर खाना चाहते हैं तो पेड़ों के फल  गायब हो जाते हैं। उनकी स्थिति बहुत ही खराब हो जाती है। राजा एक दिन मछली पकड़ कर लाते हैं। जैसे ही  रानी उसे पकाना चाहती है तो मरी मछली भी जीवित होकर नदी में कूद जाती है। उनकी स्थिति बहुत ही बिगड़ती जाती है ।लेकिन कोई उपाय नहीं रहता है। कहते हैं ना जब बुरा समय आता है तो बुद्धि भी काम नहीं करती है ।
   एक दिन तेज आंधी तूफान आता है जिसमें राजा रानी बिछड़ जाते हैं। रानी एक स्थान पर पहुंचती है जहां वह तालाब में स्नान करने जाती है। उसके रंग रूप को देखकर एक वृद्धा पहचान जाती है कि यह किसी अच्छे घर की महिला है ।इसलिए  परिचय पूछती है रानी असली परिचय तो नहीं बताती है ।कहती है कि दुर्भाग्य का कारण मैं अपने पति से बिछड़ गई हूं ।वृद्धा उसे अपने घर ले जाती है। रानी उससे कहती है कि मैं आपके घर के सारे काम तो करूंगी लेकिन मैं जूठे बर्तन नहीं धोऊंगी।वृद्धा भी उसकी बात समझ कर उसे अपने घर ले जाती है ।रानी  घर के सारे काम में सहयोग करने लगती है।
         इधर राजा भी भटकते भटकते दूसरे स्थान पर पहुंच जाते हैं। एक दिन वहां के राजा राज्य भर के सब को भोजन के लिए आमंत्रित करते हैं । वीर विक्रम भी जाते हैं ।उनकी हालत तो बहुत ही खराब रहती है। जैसे ही उनको भोजन परोसा जाता है उनका भोजन गायब हो जाता है। यह देखकर वहां के राजा उन्हें बुलाकर पूछते हैं कि क्या हो गया। तब राजा अपना असली परिचय बता देते हैं। वहां के राजा की पत्नी भी सुदशा व्रत का पालन करती थी । यह बात सुनकर कहती है कि जरूर आप पर लक्ष्मी माता का कोप हुआ है। अगर आप लोग फिर से सुदशा व्रत करें तो  लक्ष्मी माता आपको क्षमा कर देंगी। राजा कहते हैं मैं अब रानी को कहां तलाश करूँ। उसकी तलाश करते करते तो मैं यहां तक आ गया हूं। राजा उसे अपने ही महल में रहने का आग्रह करते हैं और रत्नावली की तलाश करवाते हैं।  
     सुदशा व्रत की तिथि आती है वृद्घा व्रत की तैयारी करती है।  वह अपने अकेले के लिए तैयारी करती है।जब वह आकर देखती है तो पूजा का हर  सामान दोगुना हो गया है। वह आश्चर्यचकित हो जाती है और रानी से इस बात को बताती है ।तब रानी उसको अपने असली परिचय बताती है और कहती है कि मैं भी व्रत करना चाहती हुँ।वृद्धा  और रानी खुशी-खुशी लक्ष्मी माता की पूजा  विधि विधान से करती है और अपने दाहिने हाथ में बरत बांधती  हैं।उधर राज्य की स्थिति बदलती है और वीरविक्रम को मंत्री  खोजते हुए उस राज्य में पहुंचता है। इधर रत्नावली का भी पता चल जाता है।राजा रानी को अपना राज्य वापस प्राप्त हो जाता है ।
   रानी हमेशा सुदशा व्रत का पालन करती है।
जय लक्ष्मी माता
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