Health
स्वास्थ्य ,एक अमुल्य धरोहर
सर्व शक्तिमान परमेश्वर ने सृष्टी के सृजन के साथ ही हमें बहुत सारी आवश्यक और अमूल्य चीजे प्रदान की है चाहे वो प्रकृति के रुप मे हो लौकिक या अलौकिक अग्नि, जल,पृथ्वी .. यह सब ईश्वर का अमूल्
स्वास्थ्य, एक अमूल्य धरोहर
मानव शरीर ईश्वर की सर्वोपरि देन है और इस शरीर को स्वस्थ एवं व्यवस्थित रखना मनुष्य का सर्व-प्रथम कर्तव्य है । वर्तमान महामारी के समय में तो इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ माने गये है ये है -
१- धर्म २- अर्थ ३- काम और ४- मोक्ष और इन सभी चारों को परिपूर्ण करने के लिये एक स्वस्थ शरीर की आवश्यकता होती है शायद इसी लिये एक कहावत बहुत प्रचलित है- 'एक तंदुरुस्ती हजार नियामत"..... स्वस्थ भिखारी रोगी अरबपति से ज्यादा सुखी एवं प्रसन्न रहता है, क्योंकि रोग दुखो का जड़ होता है और स्वास्थ्य सुखी जीवन का। आप निम्न लिखित से समझ सकते है कि हमारे पूर्वजों ने आरोग्य के विषय में कम शब्दों में ही कैसे हमें समझा दिया था।
''धर्मार्थ काम मोक्षाणमारोग्य् मूलमूत्य् , रोगास्तस्यापहलरि: नेयसो जीवलिस्यध"
अर्थात उत्तम आरोग्य अच्छा स्वास्थ ही धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष का मूल है। हम सभी जानते है कि रोग आरोग्य का हरण करने वाला होता है और सदाचार जीवन प्रदान करने वाला होता है। शरीर में अगर एक बार कोई रोग अपना स्थान बना लिया तो धीरे धीरे अन्य रोगों का उत्सर्जन करने में अपनी अहम भूमिका निभाता है, और रोग का सही समय पर पहचान तथा सदाचार से उसका निवारण करना आवश्यक होता है। अत: येसे शरीर को जो कि धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष की प्राप्ति का मूल आधार हो उसे पूर्णत: स्वस्थ रखना ना ही सिर्फ हमारा दायित्व है बल्कि यह ईश्वर के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा भी है।
शरीर को हम तभी पूर्ण स्वस्थ कह सकते है जब , मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य पूर्णत: विकसित एवं परस्पर एक दूसरे के सहयोगी बनते हुए एक दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हो । वास्तव में रोगी बने रहना अपने में एक कठोर अपराध ही है, क्योंकि रोगी व्यक्ति सामान्यतः किसी काम को समुचित तरीके से नही कर सकता इसलिये कहा जाता है कि रोगी व्यक्ति किसी काम का नहीं । रोगी व्यक्ति न तो अपने धर्म का सही तरीके से निर्वाह कर सकता है, न ही सही रूप में अर्थोपार्जन कर सकता है और काम या शारीरिक भोग उसके वश मे नही होते साथ ही साथ वो रोग से व्यथित होकर कलह के भँवर मे येसा फँस जाता है कि मोक्ष के बारे में तो वह सोच ही नहीं पाता। अगर मनुष्य को सही अर्थों में प्रसन्नता पूर्वक जीवन व्यतीत कर सुख भोगने है तो उसे पूर्ण स्वस्थ रह कर ही प्राप्त किया जा सकता है ।
पूर्ण स्वस्थ को समझने के लिये हमें आरोग्य का सही अर्थ समझना चाहिये स्वस्थ शरीर का तात्पर्य यह नही होना चाहिये कि जो व्यक्ति शारीरिक रूप से शक्तिशाली हो या जिसको किसी प्रकार से विशेष शारीरिक उपलब्धि प्राप्त हो वही स्वस्थ है।सामान्य कार्य को बिना रोक या थकान के करना एवं सामान्य खुराक को सामान्य तरीके से पचा लेना एक स्वस्थ व्यक्ति की पहली निशानी मानी जाती है। मनुष्य अगर संतुलित आहार,पूर्ण निद्रा, ,निर्व्यसन,व्यायाम,तनाव रहित जीवन, परमार्थ, नैतिकता ,प्राकृतिक जीवन शैली और प्रभू प्रार्थना को अगर अपना ले तो स्वस्थ्य एव समग्र विकसित अस्तित्व को प्राप्त कर सकता है।
जीवन जीने के लिये शरीर की आवश्यकता होती है और शरीर को सही और स्वस्थ बनाए रखने के लिये आहार का क्या महत्व होता है इससे हम सभी भली भांति परिचित है, इसी लिये कहा गया है कि "जैसा होगा अन्न वैसा होगा मन " अत: संतुलित एवं शाकाहारी आहार ही मनुष्य को स्वस्थ रखने के लिये सबसे उपयुक्त माना गया है।
यहाँ पर यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जन्मजात या असाध्य रोग जो कि हमारे वश मे नही होते है उन्हे अनदेखा ना किया जाये उनका सही समय पर उचित इलाज आवश्यक है, परंतु साथ ही साथ यह आवश्यक है कि आप अपने को आरोग्य रखने के लिये समुचित आहार , व्यवहार के साथ साथ सर्वशक्तिमान अपने आराध्य से स्वस्थ शरीर की कामना भी करते रहे। अत: विचार करे कि,सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में शरीर अमूल्य धरोहर है और जब तक संभव हो शरीर को स्वस्थ रखे यह परमात्मा की सच्ची सेवा भी होगी।
प. लखन लाल शर्मा, प्रदेश महासचिव, अ भा ब्रा ए परि. राजस्थान.