"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय | धीमहि तन्नः परशुराम: प्रचोदयात् ||"

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इरादा

05 Dec 2020 गोविन्द पांडेय कोलकाता 197

जय परशुराम

मन विचलित हैं, भयभीत नहीं इस अन्धकार की बेला में पथ विघटित है, अवरूद्ध नहीं इस जटिल वक्त के खेला में। जब आसमान के काले नभ व्याकुलता अधिक दिखाते हैं और तेज कड़कती बिजली से जन-मन में भय फैलाते हैं तब तीब्र वायु सा चन्चल मन नभ को विस्मित कर देता है वह हारा सा उर जाता हे बन के उत्कन्ठित रेला मे। मन विचलित हैं, भयभीत नहीं इस अन्धकार की बेला में पथ विघटित है, अवरूद्ध नहीं इस जटिल वक्त के खेला में।
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