भूमि-दान और कोंकण-केरल का सृजन
जीती हुई भूमि का दान, सागर-निवर्तन की कथा और पश्चिमी तट से जुड़ी परंपरा।
महर्षि कश्यप को दान
अधर्मी शासकों का अंत करने के बाद भगवान परशुराम ने जीती हुई समस्त भूमि महर्षि कश्यप को दान कर दी। यह त्याग का असाधारण उदाहरण है — विजय के बाद अधिकार का परित्याग।
दान के बाद उनके पास स्वयं रहने को भूमि शेष नहीं रही, क्योंकि दान की हुई भूमि पर रहना उचित नहीं था।
सागर-निवर्तन
परंपरा के अनुसार उन्होंने महेन्द्र पर्वत से परशु फेंककर सागर को पीछे हटने का आदेश दिया। जितनी दूर परशु गिरा, उतनी भूमि सागर से प्रकट हुई।
यही भूमि आज कोंकण और केरल के नाम से जानी जाती है। इसीलिए इस क्षेत्र को "परशुराम क्षेत्र" भी कहा जाता है।
सांस्कृतिक विरासत
पश्चिमी तट की अनेक परंपराएँ, मंदिर और लोककथाएँ आज भी इस प्रसंग से जुड़ी हैं। यह कथा भूमि, श्रम और त्याग के संबंध को दर्शाती है।