"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय | धीमहि तन्नः परशुराम: प्रचोदयात् ||"

ज्ञान कोश

महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका

भगवान परशुराम के माता-पिता, उनका आश्रम-जीवन और वह प्रसंग जिसने मातृ-भक्ति का आदर्श स्थापित किया।

भृगुवंश की परंपरा

महर्षि जमदग्नि भृगुवंश के तेजस्वी ऋषि थे, महर्षि ऋचीक और सत्यवती के पुत्र। उनका आश्रम तप, अध्ययन और अतिथि-सेवा का केंद्र था।

माता रेणुका राजा प्रसेनजित की पुत्री थीं। उनकी तपश्चर्या और पातिव्रत्य के कारण उन्हें ऐसी सिद्धि प्राप्त थी कि वे बिना पात्र के, केवल बालू से घड़ा बनाकर जल ला सकती थीं।

आज्ञापालन का प्रसंग

एक प्रसंग में महर्षि जमदग्नि ने अपने पुत्रों को माता का वध करने की आज्ञा दी। शेष पुत्रों ने संकोच किया, किंतु परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन किया।

प्रसन्न होकर जब महर्षि ने वर माँगने को कहा, तो परशुराम ने माता के पुनर्जीवन और उन्हें इस घटना की स्मृति न रहने का वर माँगा। यह प्रसंग आज्ञापालन और मातृ-भक्ति — दोनों का एक साथ निर्वाह दर्शाता है।

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