"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय | धीमहि तन्नः परशुराम: प्रचोदयात् ||"

ज्ञान कोश

चिरंजीवी परंपरा में भगवान परशुराम

सात चिरंजीवियों की परंपरा, उसमें भगवान परशुराम का स्थान और उसका अर्थ।

सप्त चिरंजीवी

शास्त्रों में सात चिरंजीवियों का उल्लेख है — अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम। ये वे हैं जिनका अस्तित्व कल्प-पर्यंत बना रहता है।

चिरंजीवित्व का अर्थ

चिरंजीवित्व केवल दीर्घायु नहीं है। यह उस चेतना का प्रतीक है जो काल से परे रहकर धर्म की रक्षा के लिए उपलब्ध रहती है।

भगवान परशुराम के संदर्भ में इसका अर्थ है कि विवेक और संयम का वह आदर्श कभी अप्रासंगिक नहीं होता — हर युग को उसकी आवश्यकता पड़ती है।

भावी भूमिका

पुराणों के अनुसार कलियुग के अंत में कल्कि अवतार के शस्त्र-गुरु के रूप में भगवान परशुराम की भूमिका शेष है। गुरु-रूप ही उनकी सबसे स्थायी पहचान है।

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